लेकर लौटा हूँ…….

पैरहन पे गर्द़ दिल में बेबसी लेकर लौटा हूँ,
बहोत रुसवा होकर बेक़सी लेकर लौटा हूँ!

कुछ ज्यादा नहीं महज़ ये इंतजाम कर देना,
मयख़ाना दे देना मय-कश़ी लेकर लौटा हूँ!

ख़ल्क परेशां हैं कि मिरे लहज़े को क्या हुआ,
अ’ज़ी इश्क में यही बे’रुखी लेकर लौटा हूँ!

गया था उनके रु’बरू लबों पे तबस्सुम लिए,
देखो ना आँखों में इक नदी लेकर लौटा हूँ!

हम तो बेकसूर थे…..

फ़क्त़ इन आँखों ने कुसूर किया हम तो बेकसूर थे,
हर निगाहों ने ज़ुल्म खूब किया हम तो बेकसूर थे।

नजरें मिली तो मिरे उर्दू-जब़ा पे कसीदें भी न आए,
तूने नज़रें झुकाकर कत्ल़ किया हम तो बेकसूर थे!

आफ़त यह है कि तेरी आँखों में साहिल ही नहीं है,
डूबता रह गया, तुम यूँ देखते रहे हम तो बेकसूर थे!

कि उन्हें दर्द हो….

लफ़्जों में दर्द किस हद तक भरूँ कि उन्हें दर्द हो,
हर एक ख़त में फ़क्त़ ग़’म लिखूँ कि उन्हें दर्द हो!

यकीनन वह इतने नर्म दिल के भी नहीं हैं या ख़ुदा,
किस तरह मेरी हालत बयां करूँ कि उन्हें दर्द हो!

कहीं मेरी जाँ ही न निकल जाए इंत’जार करके यूँ,
क्या अब बख्शीश में खूँ ही भेजूँ कि उन्हें दर्द हो!

बैठे हैं……

रे’त की तरह बहोत बे-जार बैठे हैं,
इश्क़ में यहाँ कितने बीमार बैठे हैं!

कोई हि’ज़्र के ग़म से तड़प रहा है,
तो कुछ वस्ल़ को बे-क़रार बैठे हैं!

साबित करने को मुहब्बत की हद,
कोई करके सबकुछ निशार बैठे हैं!

जो ग़ज़लों से कभी वाकिफ़ ना थे,
वो भी यहाँ बनके गुलज़ार बैठे हैं!

क्या ये सज़ा…….

तुमने इश्क़ में टूटकर सिर्फ़ ग़म दिया,
क्या ये सज़ा दि’ल को भी कम दिया?

भले तूने मिरे ज़ख्म पे नमक छिड़के,
हमने तो तेरे हर घाव पे मरहम दिया!

मेरी आँखों में अश्क देकर, तू खुश है,
मैंने तेरी लबों पे मुस्कान हरदम दिया!

तेरे खुश्क़ रवैये से जिस्त़ बंजर हुए हैं,
पर तू महकती रहे कि वो चम़न दिया!

जुदा होकर मुझसे….

जुदा होकर मुझसे,

जुदा होकर मुझसे,
वो भी तो रोई होगी,

तो भला कैसे मैं कह दूँ,
कि वो बेवफ़ा हो गई होगी?

जागता रहा मैं कई रात,
अज़ी जागता रहा मैं कई रात,

वो भी ना सोई होगी,
तो भला कैसे मैं कह दूँ,
कि वो बेवफा हो गई होगी?

याद कर-करके उसकी बातें,

याद कर-करके उसकी बातें,
दिल पसीजते ही जा रहे हैं,

गिरे जो मिरे अश्क आँखों से,
वो भी बेशक ही भीग गई होगी,

तो भला कैसे मैं कह दूँ,

तो भला कैसे मैं कह दूँ?
कि वो बेवफ़ा हो गई होगी!!

देख तो सही….

निशाँ-ए-जख़्म मिरे कल्ब़ में रह गए देख तो सही,
महक़-ए-हिऩा-ओ-लब़ भी रह गए देख तो सही!

क्युं तंज देती है जाँ, कि तूने मुझे तन्हा कर दिया,
सदा-ए-सांस-ए-शब रूह में रह गए देख तो सही!