किधर गये……

जुल्फ़ों को छू कर वो गुजर गये, मैं ढूढूँ उन्हें वो किधर गये,
तेज हवाओं ने गर्द यूँ किया, हम चल न सके वहीं ठहर गये।

डायरी में छुपाए थे उनकी तस्वीर, देखते ही आंखें भर गये,
शायद हमें फिर नहीं सताएंगे, ना जाने कहाँ वो निकल गये।

जब भी देखूँ तो रात नज़र आए, दूर मुझसे कहीं सहऱ गये,
अंजाम-ए-वफ़ा क्या खूब है, इश्क़ में जीते-जी हम मर गये।

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है कि नहीं……..

कोई मिरे दहलीज़ पे आके देखे अजाब़ है कि नहीं,
आँखों में अश्क़ है, और हाथों में शराब है कि नहीं।

जब वो कुर्बत में थे, तब भी दिल बेक़रार रहता था,
तुम झाँकके देखो दिल आज भी बेताब़ है कि नहीं।

लोग मानते नहीं कि कई अरसे से सुबह से जुदा हूँ,
वे मेरी जिंदगी में ढूढ़के देखें आफ़ताब है कि नहीं।

कुछ ऐसे होते हैं जो मुहब्बत को ही भुला बैठते हैं,
ये मेरी बदहाली बयाँ करे वह मुझे याद है कि नहीं।

मैं पागल जो उनकी सलामती की दुआएं करता हूँ,
वो गैरों से पूछते रहते हैं कि, वो बर्बाद है कि नहीं।

उसने जो गुल बख्शीश में दिया, अभी महफूज़ है,
मुझे फर्क नहीं उसके पास मिरे गुलाब है कि नहीं।

ना जाने कितने लमहें गुज़र चुके हैं, यूँही बैठे-बैठे,
पता नहीं मुझमें बाकी नींद-ओ-ख़्वाब है कि नहीं।

आज आईने को इसलिए ही चूर-चूर कर दिया हूँ,
मुझे तनहा देख उसने पूछा, तेरा चाँद है कि नहीं।

कातिल हो…..

आरज़ू-ए-दिल कि कोई हसीन-जाने-जाँ हयात में शामिल हो,
ख़ल्क-ए-जहां को मालूमात न हो, वो ऐसे दिल में दाख़िल हो!

जिसके रूख़सार पे इक तिल रहे, व सुर्ख़ लबों से मय़ छलके,
वो हूरे-जन्नत माशा-अल्लाह… माशाअल्लाह बड़ी कातिल हो।

किधर को चले….

लम्हें आहिस्ता-आहिस्ता किधर को चले,
हम जिधर को चलें, ग़म भी उधर चले!

रौशनी को हमसे कोई तक-लीफ़ हो जैसे,
धूप सेकने बैठूँ तो आफ़ताब गुजर चले!

खुशियों के चंद टुकड़े ही जेब में पड़े थे,
हाथों में लेके देखा तो वो भी बिखर चले!

दिले-क़रार ढूँढने चला था इक मुद्दत से,
उनको ही ढूढ़ते-ढूढ़ते बड़ी दूर चल चले!

सुनसान रेगिस्तां में जोर-जोर से चींखा,
कैसे मालूम हो मेरी जाँ कहाँ निकल चले!

परवाने की तरह फड़-फड़ाता रह गया,
पर कदम रुके नहीं मिरे वो दर-बदर चले!

काश कि……

काश कि बेरंग हयात में रंग सजाए कोई,
हर लम्हों में खुशनुमा इंद्रधनुष बनाए कोई!

उम्मीदों के दरख़्त खुश्क़ होके सो पड़े हैं,
आब से सींचकर इनको कभी जगाए कोई!

कई अरसों से हमने गीत नहीं गुन-गुनाए,
रूबरू बैठकर दिलकश ग़ज़ल सुनाए कोई!

तनहा होते ही नींदों ने भी मुँह फेर लिया,
आगोश में सुलाके आँखों में नींद लाए कोई!

जो इस दिल को सुकूँ मयस्सर करा सके,
काश कि ऐसा रहनुमा जिंदगी में आए कोई!

कुछ बेघर हुए….

कुछ खल़्क ख़ुद में ही मशरूफ़ इसकदर हुए,
कि वे नेकी से दूर हो चले, इंसा बे-कद़र हुए!

भूखे ने हुजूमे-रईसों से रोटी क्या मांग लिया,
अचानक ही वे सब के सब तितर-बितर हुए!

इंसानियत के लिबास़ में ये कैसी हैवानियत है,
कि राह पे कराहते शख़्स से सब बेख़बर हुए!

मजलूम ने रो-कर साहिब के पैर पकड़ लिया,
पर गरूर के आगे उसके अाँसू बे-असर हुए!

वो ऊपर वाला ख़ुदा भी पत्थर दिल ही होगा,
उसकी दुनियां में कुछ घर में हैं कुछ बेघर हुए।

गुलाब को……..

हर जुबाँ करे माशाअल्लाह जो देखे उस महताब़ को,
वो नूर है तो चमकेगी अमलऩ, हर सेहर हर रात को!

कितने हुए ख़ाक उन्हें चाहके कौन जाने तादाद़ को,
हुस्न वाले बेदर्द होते हैं वो क्या समझें जज़बात को!

मेरी भी आरज़ू है, उनसे बयानगी-ए-हाले-कल्ब़ हो,
मगर डर है वो कुचल ना दें, बख़्शीश-ए-गुलाब़ को!