वहीं के वहीं रहे……

वक्त़ गुजर गए और हम वहीं के वहीं रहे,
वह कहाँ निकल गए, हम वहीं के वहीं रहे।

वो होंगे मशरूफ़ नई जिं’दगानी में मगर,
जिस तन्हा दहर में थे हम वहीं के वहीं रहे।

गफ़लत तो नहीं किया उनसे दिल लगाके,
वो तो आबाद हो चले हम वहीं के वहीं रहे।

ग़र वो कभी पूछे मेरा ठिकाना किसी से,
कहना जहाँ छोड़ गए, हम वहीं के वहीं रहे।

Advertisements

कभी टूट जाओ……

पैमाना-ए-सहबा में जाम कम न हो,
ऐ साक़ी आज मुझे बे-शुमार पिलाओ!

हम बेक़रार हैं गिरफ़्त-ए-तन्हाई में,
शायरों आओ जरा मह’फिल सजाओ!

किसी के भी लब पे ख़ामोशी न रहे,
कुछ मेरी सुनो, व कुछ अपनी सुनाओ!

अहजान-ए-दिल आँखों से बह उठे,
कि हर इक ग़ज़ल में, ग़म यूँ मिलाओ!

जो वाक़िफ़ नहीं हैं गर्दिश से अभी,
उन्हें बोलो कि उल्फ़त करके दिखाओ!

अगर देखना हो, इन्तिहाँ-ए-तड़प,
तो मेरी तरह तुम भी कभी टूट जाओ!

ज़बा-ए-कैस़…..

ज़बा-ए-कैस़ से निकले वाह-वाह क्या अल्फ़ाज है,
जो ग़म का मारा है, वह सुख़नवर ला-जवाब है!

बैठके एक रोज महफिल में सिद्दत से सुनिए शेर,
यहाँ हर जुबाँ पर इरशाद, हर हाथ में शराब है!

यहाँ दिले-तरकश से लफ़्जों के तीर निकलते हैं,
इन फ़नकारों का अमलन अलग ही अंदाज है!

यहाँ पर न ढूढ़िए किसी अच्छे खासे शख़्स को,
इस ग़म के महफिल में तो हर शख़्स बर्बाद है!

वाकिफ़ हुए…..

यह जिस्त़ खुश्क बेजाऱ थे माफ़िक-ए-बयाबाँ,
तुम जो तशरीफ़ लाए नमी से वाकिफ़ हुए!

कई अरसे से ये लब मुस्कुराहट से महरूम रहे,
तुम जो तशरीफ़ लाए हँसी से वाकिफ़ हुए!

हम गु’जर-बसर कर रहे थे बे-शक हर हाल में,
तुम जो तशरीफ़ लाए जिंदगी से वाकिफ़ हुए!

इससे पहले तो रूह-ओ-कल्ब़ ग़म-जदा ही थे,
तुम जो तशरीफ़ लाए खुशी से वाकिफ़ हुए!

अब तलक़ तो हमने दिललगी कितनों से की है,
तुम जो तशरीफ़ लाए आशिकी से वाकिफ़ हुए!

हम बहुत रोए……

दर्दे-बारिश में भीगकर हम बहुत रोए,
तुम्हें हर पल सोच’कर हम बहुत रोए!

लम्हें कैसे कट रहे हैं क्या बताऊँ तुम्हें,
न जाने क्युं रह-रहकर हम बहुत रोए!

तेरी यादों के गुल जब खिलने लगे तो,
भरी आँखों से हँसकर हम बहुत रोए!

तेरी तस्वीर को इत्मिनाऩ से देखा तो,
बे-कऱारी से उलझकर हम बहुत रोए!

ये जो ग़म है यही उल्फत़ की सज़ा है,
हाँ इसी ग़म में ढलकर हम बहुत रोए!

खैर वो शब़े-हिज्र आज भी न भूला मैं,
जब तेरे पांव पकड़कर हम बहुत रोए!

यूँ न जाओ इल्तिज़ा कितनी दफ़ा की,
चले गए तो सिसककर हम बहुत रोए!

मैं भी तो देखूँ……

तेरे हुस्ऩ के चर्चे हर ज़बाँ पे है आजकल,
यह पर्दा हटाओ कि जरा मैं भी तो देखूँ!

लोग कहते हैं तुम हँसके कत्ल करती हो,
चलो मुस्कुराओ कि जरा मैं भी तो देखूँ!

सुना हूँ तुम पास आ’कर सुकूँ लूटती हो,
रू-ब-रू आओ, कि जरा मैं भी तो देखूँ!

अफ़वाह है तेरी सदाएं शहद की तरह है,
कभी गुनगुनाओ कि जरा मैं भी तो देखूँ!

इन सुर्ख़ लबों में शराब है, नशा बहोत है,
मुझे भी पिलाओ कि जरा मैं भी तो देखूँ!

तुम शर्म से झुककर बड़ी हसीं लगती हो,
ऐ जान शरमाओ कि जरा मैं भी तो देखूँ!

कुछ तो बात जरूर है…..

बेशुमार ग़ज़लें लिख रहे हो, कुछ तो बात जरूर है,
बड़े बदले-बदले लग रहे हो, कुछ तो बात जरूर है!

यूँ शेर पे शेर अर्ज़ तुम पहले तो नहीं करते थे जी,
अब जो शायराना हो रहे हो, कुछ तो बात जरूर है!

आँखों में आँखें डालकर क्युं गुफ्त़गू नहीं करते तुम,
नजरें जो सबसे चुरा रहे हो, कुछ तो बात जरूर है!

ऐसी भी क्या जल्दी है तुमको जो उठकर चल दिए,
यूँ जो तनहा हुए जा रहे हो, कुछ तो बात जरूर है!

तुम अकेलेपन को सीने से लगाके बैठे हो आजकल,
बे-वजह ही मुस्कुरा रहे हो, कुछ तो बात जरूर है!