देख तो सही….

निशाँ-ए-जख़्म मिरे कल्ब़ में रह गए देख तो सही,
महक़-ए-हिऩा-ओ-लब़ भी रह गए देख तो सही!

क्युं तंज देती है जाँ, कि तूने मुझे तन्हा कर दिया,
सदा-ए-सांस-ए-शब रूह में रह गए देख तो सही!

हुए हैं…..

बूंद-ए-सुकूँ-ए-बारिश हकीकत न रहे अफ़सना हुए हैं,
वो पत्थर बरसाकर चल दिए, और हम फ़ना हुए हैं!

अल़-ए-फ़रेब से हम अनजान थे, अनजान ही रह गए,
अस्काम़ तो उनके खूँ में थी, तभी वो बे-वफ़ा हुए हैं!

इत्हिाम़ उन्हें दूँ या मैं कोसूँ मिरे दिल को या ख़ुदा,
जो सोजे-दरूँ बहोत है, इन्तिहां-ए-इब़्तिला हुए हैं!

इश्तियाक़-ए-रूह कि कोई कत्ल़ करदे बे-मौत मुझको,
जिस्त़ क़फ़स में घुट रही है युँ, कि जुबाँ बेसदा हुए हैं!

क्या पता…..

क्या पता मिरे जख़्म भरेंगे भी या नहीं,
क्या पता ये स्याह रात ढलेंगे भी या नहीं!

जुस्तजू में बदहवास कदम थम नहीं रहे,
क्या पता वह मुझको मिलेंगे भी या नहीं!

उन्हें सोच-सोचकर हम बहोत रो लिए,
क्या पता अब अ’श्क़ गिरेंगे भी या नहीं!

इस कलेजे पर जो शोले द’हक रहे हैं,
क्या पता कि वे शोले बुझेंगे भी या नहीं!

क्या पता कि फिर क़रार आए न आए,
क्या पता इश्क़े-गुल खिलेंगे भी या नहीं!

खुशी क्या है…..

ग़म के रू-ब-रू होकर मुझे मालूम हुआ,
कि जिस्त़ में अहमियत-ए-खुशी क्या है!

ग़र सीने में सुकूँ ना हो, बस बेकरारी रहे,
बेशक हँसो, पर वो मजा-ए-हँसी क्या है!

यहाँ खल्क अदब से भी दिल तोड़ देते हैं,
क्या बताऊँ सरकशी व शाइस्तगी क्या है!

मुझे उस ऊँचाई की दरकार हरगिज़ नहीं,
कि मैं गरूर में भूल जाऊँ ये जमीं क्या है!

मर न सका…….

इन उलझनों से मैं उबर न सका,
मुझे यही ग़म है कि मर न सका!

वह तो मेरी रू’ह में मौजूद रही,
पर मैं कभी उसमें उतर न सका!

मेरे इश्क़ को उसने ठुकरा दिया,
बिखर गया यूँ कि सवर न सका!

जिंदगी मुझे जहर पिलाती रही,
मगर मैं उसे इंकार कर न सका!

भारत के महान्यायवादी ( Attorney General of India )…

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“भारत के महान्यायवादी” ( Attorney General of India )

भारतीय संविधान ( Indian Constitution ) में अनुच्छेद-७६ के तहत भारत के महान्यायवादी के पद की व्यवस्था है | महान्यायवादी ( Attorney General ) देश का सर्वोच्च कानून अधिकारी होता है | वह कानून के मामले में निपुण होता है |

• महान्यायवादी की नियुक्ति एवम् कार्यकाल➡

महान्यायवादी ( अटार्नी जनरल ) की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं | महान्यायवादी के पद पर आसीन होने के लिए किसी भी व्यक्ति में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर योग्यता होना जरूरी है | महान्यायवादी में निम्न योग्यताएं जरूरी है-

१) वह भारत का नागरिक हो |
२) उसके पास उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में 5 वर्ष तक कार्य करने का अनुभव हो |
३) वह किसी न्यायालय में 10 वर्ष तक वकालत कर चुका हो |
४) राष्ट्रपति के अनुसार वह न्यायिक मामले में योग्य हो |

भारतीय संविधान में महान्यायवादी के कार्यालय को निश्चित नहीं किया गया है | तथा उसे हटाने के लिए भी कोई मूल व्यवस्था का उल्लेख नहीं है | वह अपने पद पर राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत बना रह सकता है | इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि राष्ट्रपति उसे किसी भी समय हटा सकते हैं | महान्यायवादी किसी भी समय राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र देकर पदमुक्त हो सकता है |

फिलहाल तो यही परंपरा है कि, जब सरकार ( मंत्रिपरिषद ) त्यागपत्र देती है, तब महान्यायवादी भी त्यागपत्र देता है | क्योंकि सरकार की सिफारिश से ही उसकी नियुक्ति की जाती है | महान्यायवादी के वेतन भी राष्ट्रपति तय करते हैं | भारत के संविधान में महान्यायवादी ( Attorney General ) के पारिश्रमिक अर्थात वेतन निर्धारित नहीं है |

• महान्यायवादी के कार्य एवम् शक्तियाँ➡

भारत सरकार के कानून अधिकारी के रूप में महान्यायवादी के कर्तव्य-

१) वह भारत सरकार को विधि संबंधी उन विषयों पर परामर्श दे जो राष्ट्रपति द्वारा उसे सौंपे गए हों |

२) उसे भारतीय संविधान अथवा किसी अन्य विधि द्वारा प्रदान किए गए कार्यों का निर्वहन करना चाहिए |

३) वह विधिक स्वरूप ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करे जो राष्ट्रपति ने उसे सौंपा है |

• राष्ट्रपति द्वारा महान्यायवादी को सौंपे जाने वाले कार्य-

१) सरकार से संबंधित किसी मामले में उच्च न्यायालय में सुनवाई का अधिकार |

२) संविधान के अनुच्छेद-१४३ के तहत वह राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय में सरकार का प्रतिनिधित्व करता है/पक्ष रखता है |

३) वह भारत सरकार से संबंधित मामलों को लेकर उच्चतम न्यायालय में भारत सरकार की ओर से पेश होता है |

• महान्यायवादी के अधिकार एवम् मर्यादा-

महान्यायवादी के पास ये अधिकार है कि वह किसी भी भारतीय क्षेत्र में या अदालत में सुनवाई कर सकता है | इसके अलावा वह संसद के दोनो सदनों ( लोकसभा, राज्यसभा ) में बोल सकता है तथा कार्यवाही में शामिल हो सकता है | उसे संसद के सदस्यों की भाँति भत्ते तथा विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं |

• भारत के महान्यायवादी की सीमाएँ-

१) वह भारत सरकार के विरुद्ध कोई सलाह एवम् विश्लेषण नहीं कर सकता |

२) वह किसी भी आपराधिक मामले में किसी व्यक्ति का बचाव भारत सरकार की अनुमति के बगैर नहीं कर सकता |

३) यदि भारत सरकार उसे किसी मामले में पेश होने को कहे तब वह उन मामलों पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता |

४) वह भारत सरकार की अनुमति के बगैर किसी भी परिषद अथवा कंपनी के निदेशक का पद ग्रहण नहीं कर सकता |

५) स्मरण रहे कि महान्यायवादी भारत सरकार का पूर्णकालिक वकील नहीं होता है, वह कोई सरकारी कर्मी नहीं है, अतः उसे “निजी विधिक कार्यवाही से वंचित नहीं कर सकते |

• महान्यायवादी की सहायता हेतु “महाधिवक्ता” एवम् “अपर-महाधिवक्ता”-

महान्यायवादी ( अटार्नी जनरल ) के अलावा भारत सरकार के अन्य कानून अधिकारी होते हैं | जिनमें शामिल हैं- भारत सरकार के महाधिवक्ता एवम् अपर महाधिवक्ता | ये दोनों महान्यायवादी को उनके कार्यों में सहायता करते हैं | महान्यायवादी का पद संविधान द्वारा निर्मित है किन्तु महाधिवक्ता तथा अपर महाधिवक्ता का उल्लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद-७६ में नहीं है | महान्यायवादी केन्द्रीय कैबिनेट का सदस्य नहीं होता | सरकारी स्तर पर ” विधिक मामलों ” को देखने के लिए केन्द्रीय कैबिनेट में अलग से “विधि मंत्रि” होते हैं |

संसदीय प्रक्रिया ( भाग-२ )…

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• संसदीय प्रस्ताव ( Parliamentary Motion )

‘संकल्पों’ तथा ‘प्रस्तावों’ के माध्यम से ही संसदीय कार्यवाही को चलाते हैं | यही तो संसदीय कार्यवाही के साधन हैं | संसद के सदस्य इसी माध्यम से सदन में अपनी बात रखते हैं | या यूँ कहें कि लोकहित से संबंधित मामलों जिसमें आम जनमानस के हित निहित हों, को सदन में उठाते हैं | संसद के सदस्यों द्वारा संसद में रखे जाने वाले कुछ प्रस्ताव तथा उनके आशय:-

• स्थगन प्रस्ताव ( Adjournment Motion )

यदि देश में कोई विशेष घटना घटित हो जाए, अथवा कोई विशेष स्थिति उत्पन्न हो जाए तो संसद के सदस्य अध्यक्ष की अनुमति से यह प्रस्ताव कर सकते हैं कि सदन की वर्तमान कार्यवाही को स्थगित कर देना चाहिए तथा इस विशेष घटना, स्थिति या प्रश्न पर विचार करना चाहिए | इसी प्रक्रिया को कार्य स्थगन प्रस्ताव कहते हैं | इस प्रस्ताव को प्रश्न काल की समाप्ति के पश्चात पेश करते हैं | शाम 4 बजे से विचार-विमर्श शुरू करते हैं | यदि यह प्रस्ताव किसी लोकहित के महत्वपूर्ण विषय से संबंधित है तभी अध्यक्ष इसे अनुमति देते हैं | यह प्रस्ताव करीब 50 सदस्यों द्वारा समर्थित होना चाहिए | स्थगन प्रस्ताव पर चर्चा आरंभ होने के बाद अध्यक्ष सभा को प्रस्ताव के निपटारा होने के पहले स्थगित नहीं कर सकते | हालांकि इस प्रस्ताव के पारित होने पर सरकार को त्यागपत्र देना आवश्यक नहीं है |

• ध्यानाकर्षण प्रस्ताव ( Call Attention Motion )

किसी सार्वजनिक हित की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण विषय की ओर मंत्री का ध्यान आकर्षित किया जाना, तथा उससे संबंधित प्रश्न पूछना ही ” ध्यानाकर्षण प्रस्ताव ” है | इस प्रस्ताव के द्वारा सम्बद्ध मंत्री से प्रस्तुत विषय पर जवाब देने के लिए आग्रह किया जाता है | मंत्री तत्काल जवाब दे सकते हैं, या जवाब देने के लिए कुछ समय भी माँग सकते हैं |

• विशेषाधिकार प्रस्ताव ( Privilege Motions )

यदि कोई भी मंत्री तथ्यों को छिपाता है, या गलत जानकारी ( Information ) देकर संसद के किसी सदन या सदस्यों के विशेषाधिकार का हनन करता है, तब इस परिस्थिति में संसद का कोई भी सदस्य मंत्री से खिलाफ ” विशेषाधिकार प्रस्ताव ” रख सकता है | इस प्रस्ताव का उद्देश्य सम्बद्ध मंत्री की निन्दा करना है |

• निन्दा प्रस्ताव ( Censure Motion )

इस प्रस्ताव को केवल लोकसभा में प्रस्तुत कर सकते हैं। विपक्षी दल के सदस्यों द्वारा सरकार की नीतियों ( Policies ) तथा कार्यों के लिए मंत्री या शासन के विरुद्ध निन्दा प्रस्ताव रखा जाता है | इस प्रस्ताव को प्रस्तुत करने के लिए कारण या आधार बताना भी आवश्यक नहीं है | यदि निन्दा प्रस्ताव लोकसभा में पारित हो जाए तो सरकार को सदन में बहुमत सिद्ध करना आवश्यक हो जाता है |

• कटौती प्रस्ताव ( Cut Motion )

बजट में जो माँग किया जाता है, उन माँगों में कटौती करने के लिए प्रस्तुत किए गए प्रस्ताव को “कटौती प्रस्ताव” कहा जाता है | यदि लोकसभा में कटौती प्रस्ताव पारित हो जाए तो इसका तात्पर्य है कि ” सरकार के प्रति अविश्वास की स्थिति है ” | अतः लोकसभा में कटौती प्रस्ताव पास होने पर सरकार को त्यागपत्र देना पड़ता है | पीठासीन अधिकारी स्वविवेक से कटौती प्रस्ताव को अनुमति देता है |

तीन प्रकार के कटौती प्रस्ताव हैं:-

१) नीतिगत कटौती ( Disapproval of policy cut )
२) अर्थगत कटौती ( Economic cut )
३) प्रतीक कटौती ( Token cut )

• अविश्वास प्रस्ताव ( No-Confidence Motion )

जैसा कि हमने प्रथम भाग में उल्लेख किया था कि संविधान के अनुच्छेद-११८ के अनुसार भारतीय संसद के प्रत्येक सदन को यह अधिकार दिया गया है कि वे अपनी प्रक्रिया एवम् कार्य-संचालन के लिए नियम बना सकते हैं | इसलिये लोकसभा ने अपने नियम-१९८ के तहत मंत्रीपरिषद के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया के लिए नियम का निर्माण किया | यह प्रस्ताव केवल लोकसभा के लिए है | इस प्रस्ताव को विपक्षी दल प्रस्तुत करते हैं | इस प्रस्ताव के लिए करीब 50 सदस्यों का अनुसमर्थन आवश्यक है | ज्ञात रहे, अविश्वास प्रस्ताव का जिक्र भारत के संविधान में नहीं है |

कम से कम 50 सदस्यों के समर्थन से इसे सदन में पेश करते हैं, इसे प्रस्तुत करने से पहले विशेष कारण अथवा आधार बताना जरूरी नहीं है | इस प्रस्ताव पर विचार करने के लिए ‘समय का निर्धारण’, “कार्य मंत्रणा समिति” ( Business advisory committee ) द्वारा किया जाता है | प्रस्ताव पर विचार एवम् विमर्श पूर्ण होते ही अध्यक्ष उसे मतदान हेतु रखता है, यदि ” अविश्वास प्रस्ताव ” पारित हो जाए तो मंत्रीपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है |