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शेरो शायरी

मेरी ख़ता है क्या…..

तेरा एक दीदार पाकर हम सुलग उठे इसमें मेरी ख़ता है क्या,
तू मुस्कुराए और मिरे रूह तड़प उठे इसमें मेरी ख़ता है क्या!

एक तो संग’मरमर के मा’फिक़ बदन उसपर ये ख़ास पैरहन,
हम इस गुलफ़ाम बदन पे फिसल उठें इसमें मेरी ख़ता है क्या!

वो शख़्स जो तेरे करीब है कैसे काबू करता होगा खुद पर जां,
हम तो सिर्फ़ तुम्हें देखकर सिहर उठे इसमें मेरी ख़ता है क्या?

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शेरो शायरी

गिरा तो सही…..

इस बेक़रार दिल पे कुछ यूँ कहर ढा तो सही,
ऐ सनम इन रस भरी होंठों से पिला तो सही!

इक जमाने से ये जिस्म सूखकर बेजां पड़े हैं,
मुझे तेरी बर’सात में मुकम्मल भिगा तो सही!

रुख़’सार शर्म से सुर्ख़, नि’गाहें झुकी रहे क्युं,
ऐ जान सिर्फ़ इक दफ़ा नजरें मिला तो सही!

उंगलियों से जुल्फ़ों को यूँ न पे’शानी से हटा,
ताउम्र इसी अंदाज में बिजली गिरा तो सही!

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शेरो शायरी

तमाशा बना देंगे…..

दिल की बात यूँ बताओगे तो लोग तमाशा बना देंगे,
उलझने जुबां पर लाओगे तो लोग तमाशा बना देंगे!

ग़म है भी ग़र तो किसी कोने में दफ़्न कर लेना तुम,
ऐसे सरे-आम दिखाओगे तो लोग तमाशा बना देंगे!

खुद पे क्या गुजरी ये बात खुद तक रहे तो ठीक है,
सभी को हाल सुनाओगे तो लोग त’माशा बना देंगे!

बिखरने को जी करे तो अकेले में ही बिखरना दोस्त,
हुजूम में बिखर जाओगे तो लोग तमाशा बना देंगे!

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शेरो शायरी

ख़ता मुझसे……

मुझे ब’दस्तूर न ढूढ़े तेरी आँखें अब रहे ख़फा मुझसे,
तू फ़क्त़ ये तो बता स’नम कि हुई क्या ख़ता मुझसे!

अदा-ए-नजऱ’अंदाज नये-नये कहाँ से सीखे तूमने,
जफ़ा इस’कदर जारी है कि न हो सके
बयां मुझसे!

तूने आ’ईना दिखा दिया, कि मैं क्या हूँ तेरी नज़र में,
अब तो गिरके टूट जाया करते हैं हर आईना मुझसे!

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Indian constitution & Laws

What’s Epidemic diseases Act, 1897??

Photo Source- Pexels.

What’s Epidemic diseases Act, 1897?

( Total information about it )

• Nowadays many countries are suffering from corona virus, in which millions of people have lost their lives. India is also struggling with this pandemic for almost two months, Though, Here situation is not very bad but we don’t take it easily.

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रात ढल गई…..

रात ढल गई इस आस में कि तुम आओगे ज़रूर,
आते ही जुबाँ से आवाज़ देकर बुलाओगे ज़रूर!

मैं दौड़ा आऊंगा तेरी इक सदा सुन कर जाने-जाँ,
बहुत अरमान थे मुझमें कि गले लगाओगे ज़रूर!

ख़ुदा न ख़ास्ता ग़र ये शमा बुझ जाये राह तकते,
मिरे मकां में च़राग-ए-मुहब्बत जलाओगे जरूर!

होंठ भीग रहे थे आब-ए-तल्ख़-ए-अब्सार से यूँ,
यकीन था कि पुरनम-लब़ों को हँसाओगे ज़रूर!

इन खिड़कियों से झाँक-झाँककर देखता रहा मैं,
किसी पल किसी दर पे तो दिख जाओगे ज़रूर!

रात ढल गई इस आस में कि तुम आओगे ज़रूर…………………………..!!!!