क्या कहूँ….

यूँ मुझे उलझाके रख दिया क्या कहूँ इस रात को,
समझ नहीं आता तुम्हें देखूँ या देखूँ उस चाँद को!

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लाज़मी नहीं है….

मुझे किसी पर यकीं नहीं है, कदमों के नीचे जमीं नहीं है,
ग़म बहोत है मिरे सीने में, पर आँखों में क्युं नमी नहीं है।

मैं किसको बेदाग़ कहूँ, किस शख़्स में कोई कमी नहीं है,
आँखों में ख़्वाब सजते नहीं, अब होंठो पर हँसी नहीं है।

ग़ज़ल बेज़ार लगे हमको, कुछ मज़ा मौस़िकी में नहीं है,
वो हमें गम़-जदा किए, हम भी वही करें लाज़मी नहीं है!

मुहब्बत को कभी रुसवा करें, हम ऐसे हम़-नशीं नहीं हैं,
सिर्फ़ वफ़ा की ही तलब़ करे, ये दिल यूँ खुदगर्ज़ नहीं है।

देख लो……

कि फिर न हो दीदार आज जी भरकर देख लो,
रूह को आखिरी सुकूँ मिले इस-क़दर देख लो!

ग़र आज तुम आईना देखो तो मेरी सूरत दिखे,
मेरे सनम तुम मेरे अक्स को दर-बदर देख लो!

इतनी भी क्या बेरुखी है हाथ यूँ न झटको जाँ,
जाते-जाते मुड़कर मुझे, जाने-जिग़र देख लो!

ये शब़े-हिज़्र किसी वस्ल़ की रात से कम नहीं,
एक मर्तब़ा उस दिलकश चाँदे-सज़र देख लो!

धक-धक करके जान दिल से निकल न जाए,
हाथ रखके दिल पे क्या हुआ असर देख लो!

जाँ मत निकालो…..

सिलवट-ए-होंठ दिखाकर मेरी जाँ मत निकालो, ऐ जान ऐसे मुस्कुराकर मेरी जाँ मत निकालो!

इस सुर्ख़ दुपट्टे से जिस्म को लिहाज़ से ढक लो, तुम ना ऐसे कसमसा-कर मेरी जाँ मत निकालो!

मोम के माफ़िक नर्म गुलों की तरह गुलफ़ाम हो, मिरे बेहद रूबरू आकर मेरी जाँ मत निकालो!

मय़-गुसार हर-गिज़ नहीं हूँ तलब़-ए-नशा नहीं, यूँ जाम़े-लब़ छलकाकर मेरी जाँ मत निकालो!

मुझमें जीने की ख़्वाहिशें अभी और भी है जाँ, तुम निगाँहें मिलाकर मेरी जाँ मत निकालो!

उठाता रहुंगा….

गश़ में बे-जान आँखों को जगाता रहुंगा, यूँही मुकद्दर को पैहम़ आजमाता रहुंगा!

चलते-चलते राह में गिर भी जाऊँ मगर, थके-पा को हौंसला देकर उठाता रहुंगा!

इस दहऱ को कुछ भी मालूमात ना चले, रोऊंगा मगर अश्क़ों को छुपाता रहुंगा!

माना कि वो अपने कदम पीछे कर रहे, पर मैं तो उनकी कुर्बत में जाता रहुंगा!

रात ढल गई…..

रात ढल गई इस आस में कि तुम आओगे ज़रूर,
आते ही जुबाँ से आवाज़ देकर बुलाओगे ज़रूर!

मैं दौड़ा आऊंगा तेरी इक सदा सुन कर जाने-जाँ,
बहुत अरमान थे मुझमें कि गले लगाओगे ज़रूर!

ख़ुदा न ख़ास्ता ग़र ये शमा बुझ जाये राह तकते,
मिरे मकां में च़राग-ए-मुहब्बत जलाओगे जरूर!

होंठ भीग रहे थे आब-ए-तल्ख़-ए-अब्सार से यूँ,
यकीन था कि पुरनम-लब़ों को हँसाओगे ज़रूर!

इन खिड़कियों से झाँक-झाँककर देखता रहा मैं,
किसी पल किसी दर पे तो दिख जाओगे ज़रूर!

रात ढल गई इस आस में कि तुम आओगे ज़रूर…………………………..!!!!

आब रहने दो…

जवां-जिस्म-ए-आग़ है अभी आग़ रहने दो, खुद-ब-खुद बुझ उठेंगे अभी आब रहने दो!

घोल-घोलकर पिलाओ नशा उतरने न देना, मिरे सिरहाने तुम अय़गा-ए-शराब रहने दो!

ख़ुशबू-ए-जुल्फ़ भले तलातुम में बह गए, मिरे पास वो खुश्क़-सुर्ख़े-गुलाब रहने दो!