संसदीय प्रक्रिया ( भाग- १ )…

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“संसदीय प्रक्रिया” ( Parliamentary Procedure )

संसद जिसे आंग्ल भाषा में Parliament कहते हैं, इसके तीन अंग हैं, यथा-

१) राष्ट्रपति ( President )
२) लोकसभा ( House of the people )
३) राज्यसभा ( Council of State )

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-79 में लिखा है कि “संघ के लिए एक संसद होगी जो राष्ट्रपति एवम् दोनों सदनों ( लोकसभा, राज्यसभा ) से मिलकर बनेगी |

भारतीय संविधान ( Indian constitution ) के अनुच्छेद-118 के अनुसार संविधान के उपबंधों के अधीन रहकर संसद के दोनों सदनों को अपनी प्रक्रिया तथा कार्यों के संचालन हेतु नियम निश्चित करने का अधिकार है |

वर्तमान समय में भारतीय संसदीय प्रक्रिया तथा उसके कार्यों के सम्पादन की व्यवस्था निम्नलिखित है:-

• प्रश्न काल ( Question Hour )

संसद के दोनों सदनों में प्रतिदिन बैठक के बाद कार्यवाही का प्रथम घण्टा ( दोपहर 11 बजे से 12 बजे तक ) प्रश्न काल होता है | प्रश्न काल के दौरान संसद के सदस्य लोक-महत्व से संबंधित राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय सभी मामलों पर जानकारी हेतु मंत्रिपरिषद से प्रश्न पूछते हैं | इंग्लैंड में भी ये प्रक्रिया विद्यमान है| संसद में तीन तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं-

१) तारांकित प्रश्न ( Stared Question )

जब प्रश्नकर्ता सदन में तत्काल उत्तर चाहता है तो वह प्रश्न के शीर्ष पर तारा ( * ) लगा देता है| इसलिये इसे तारांकित प्रश्न कहते हैं| तारांकित प्रश्न का उत्तर तुरंत मौखिक रूप से दिया जाता है, तथा इससे संबंधित पूरक प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं| अध्यक्ष या सभापति तय करते हैं कि कोई प्रश्न तारांकित है या नहीं|

२) अतारांकित प्रश्न ( Unstared Question )

जब प्रश्नकर्ता अपने प्रश्नों का उत्तर तुरंत नहीं चाहता तब वह प्रश्न के शीर्ष पर Star ( * ) नहीं लगाता | अतारांकित प्रश्न का उत्तर लिखित रूप में दिया जाता है, इसलिए इससे संबंधित पूरक प्रश्न नहीं पूछे जा सकते हैं | प्रश्नों से सम्बद्ध मंत्री प्रश्न का लिखित उत्तर सदन के पटल पर प्रस्तुत करता है |

३) अल्प सूचना प्रश्न-

किसी भी लोकमहत्व के तत्कालिक मामले से संबंधित प्रश्न को “अल्प सूचना का प्रश्न” कहते हैं | इसका उत्तर मौखिक रूप में दिया जाता है | साधारण प्रश्न को पूछने के लिए 10 दिनों की पूर्वानुमति आवश्यक है |

• पूरक प्रश्न-

जब मंत्री किसी प्रश्न का उत्तर देते हैं तथा उत्तर की किसी बात को लेकर जो प्रश्न पूछा जाता है उसे “पूरक प्रश्न” कहते हैं |

• आधे घण्टे की चर्चा-

संसद के सदन में लोक महत्व से जुड़े विभिन्न प्रश्न पूछे जाते हैं, तथा सम्बद्ध मंत्रियों द्वारा लिखित अथवा मौखिक जवाब दिए जाते हैं, फिर भी, उत्तर में कुछ ऐसे तथ्य अन्तर्विष्ट हो सकते हैं जिनका स्पष्टीकरण आवश्यक हो, तब उस स्थिति में उस तथ्य को चर्चा के लिए संसद में रखा जाता है | सामान्यतः इस तरह की चर्चा बैठक के आखिरी आधे घण्टे ( 5 PM – 5:30 PM ) के मध्य की जाती है | लोकसभा में सप्ताह में तीन दिन, सोमवार, बुद्धवार, तथा शुक्रवार तथा राज्यसभा में सभापति की अनुमति से किसी भी समय ऐसी चर्चा कर सकते हैं | चर्चा के कम से कम तीन दिन पूर्व इसकी सूचना लिखित रूप में देना जरूरी है |

• शून्य काल ( Zero hour )

सर्वप्रथम ये जान लेना आवश्यक है कि भारतीय संसदीय प्रक्रिया में शून्य काल शब्द का उल्लेख नहीं है | यह समय ठीक 12 बजे ( 00 बजे ) आरंभ होता है, अतः इसे मीडिया ने “शून्यकाल” नाम दे दिया | प्रश्न काल के तुरंत बाद के एक घण्टे का समय ‘शून्य काल’ होता है | इस दौरान विचार हेतु ‘विषय’ पहले से निर्धारित नहीं होता है, शून्य काल के दौरान सार्वजनिक महत्व के प्रश्नों को बिना किसी पूर्व सूचना के भी उठा सकते हैं, तथा किसी मंत्री को उत्तर देने के लिए कहा जा सकता है | इसे ‘प्रश्न-उत्तर सत्र’ भी कहते हैं | शून्य काल में कुल 20 मामले उठाए जा सकते हैं |

• अल्पकालिक चर्चा-

किसी अविलम्बनीय लोक महत्व के विषय पर गैर सरकारी सदस्य अल्पकालीन चर्चा उठा सकता है | इसके लिए दो घण्टे निर्धारित हैं | सप्ताह में दो दिन मंगलवार तथा गुरुवार को अल्पकालिक चर्चा करते हैं | इस चर्चा को उठाने के लिए किसी मामले का संक्षिप्त वर्णन करके, उसके कारणों का उल्लेख करते हैं, चर्चा उठाने वाला सदस्य इसकी सूचना महासचिव को देता है, सूचना पर दो सदस्यों के हस्ताक्षर भी जरूरी है | चर्चा की स्वीकार्यता से संबंधित अंतिम निर्णय अध्यक्ष/सभापति करते हैं |

• व्यवस्था का प्रश्न ( Point of Order )

संसद की कार्यवाही के दौरान, कभी इरादतन या गैर-इरादतन संसदीय प्रक्रिया का उल्लंघन भी हो सकता है, इस स्थिति में संसद का कोई भी सदस्य व्यवस्था का प्रश्न उठा सकता है | इस प्रश्न को उठाने से सदन की कार्यवाही निलंबित हो जाती है एवम् जो सदस्य उस वक्त़ सदन में बोल रहा होता है उसे अपना भाषण रोकना पड़ता है |

प्रायः विपक्षी सदस्‍य सरकार पर कंट्रोल बनाने के लिए इस प्रश्न को उठाते हैं | पीठासीन अधिकारी निर्णय करते हैं कि कोई प्रश्न व्यवस्था का प्रश्न है या नहीं |

Indian constitution, Article- 13. ( Law Inconsistent with Fundamental Rights )

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Indian constitution,
Article- 13. ( Law Inconsistent with Fundamental Rights )

अनुच्छेद-13 पर गौर करने से पहले मूल अधिकारों पर एक नजर-

भारत के “मूल संविधान” में प्रत्येक नागरिकों के लिए कुल 7 मौलिक अधिकार ( Fundamental rights ) तय किए गये थे। किन्तु वर्तमान में 6 मौलिक अधिकार हैं, जो नागरिकों के हित के लिए परम आवश्यक हैं। वे छ: मूल अधिकार हैं:-

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वहीं के वहीं रहे……

वक्त़ गुजर गए और हम वहीं के वहीं रहे,
वह कहाँ निकल गए, हम वहीं के वहीं रहे।

वो होंगे मशरूफ़ नई जिं’दगानी में मगर,
जिस तन्हा दहर में थे हम वहीं के वहीं रहे।

गफ़लत तो नहीं किया उनसे दिल लगाके,
वो तो आबाद हो चले हम वहीं के वहीं रहे।

ग़र वो कभी पूछे मेरा ठिकाना किसी से,
कहना जहाँ छोड़ गए, हम वहीं के वहीं रहे।

वाकिफ़ हुए…..

यह जिस्त़ खुश्क बेजाऱ थे माफ़िक-ए-बयाबाँ,
तुम जो तशरीफ़ लाए नमी से वाकिफ़ हुए!

कई अरसे से ये लब मुस्कुराहट से महरूम रहे,
तुम जो तशरीफ़ लाए हँसी से वाकिफ़ हुए!

हम गु’जर-बसर कर रहे थे बे-शक हर हाल में,
तुम जो तशरीफ़ लाए जिंदगी से वाकिफ़ हुए!

इससे पहले तो रूह-ओ-कल्ब़ ग़म-जदा ही थे,
तुम जो तशरीफ़ लाए खुशी से वाकिफ़ हुए!

अब तलक़ तो हमने दिललगी कितनों से की है,
तुम जो तशरीफ़ लाए आशिकी से वाकिफ़ हुए!

हम बहुत रोए……

दर्दे-बारिश में भीगकर हम बहुत रोए,
तुम्हें हर पल सोच’कर हम बहुत रोए!

लम्हें कैसे कट रहे हैं क्या बताऊँ तुम्हें,
न जाने क्युं रह-रहकर हम बहुत रोए!

तेरी यादों के गुल जब खिलने लगे तो,
भरी आँखों से हँसकर हम बहुत रोए!

तेरी तस्वीर को इत्मिनाऩ से देखा तो,
बे-कऱारी से उलझकर हम बहुत रोए!

ये जो ग़म है यही उल्फत़ की सज़ा है,
हाँ इसी ग़म में ढलकर हम बहुत रोए!

खैर वो शब़े-हिज्र आज भी न भूला मैं,
जब तेरे पांव पकड़कर हम बहुत रोए!

यूँ न जाओ इल्तिज़ा कितनी दफ़ा की,
चले गए तो सिसककर हम बहुत रोए!

मैं भी तो देखूँ……

तेरे हुस्ऩ के चर्चे हर ज़बाँ पे है आजकल,
यह पर्दा हटाओ कि जरा मैं भी तो देखूँ!

लोग कहते हैं तुम हँसके कत्ल करती हो,
चलो मुस्कुराओ कि जरा मैं भी तो देखूँ!

सुना हूँ तुम पास आ’कर सुकूँ लूटती हो,
रू-ब-रू आओ, कि जरा मैं भी तो देखूँ!

अफ़वाह है तेरी सदाएं शहद की तरह है,
कभी गुनगुनाओ कि जरा मैं भी तो देखूँ!

इन सुर्ख़ लबों में शराब है, नशा बहोत है,
मुझे भी पिलाओ कि जरा मैं भी तो देखूँ!

तुम शर्म से झुककर बड़ी हसीं लगती हो,
ऐ जान शरमाओ कि जरा मैं भी तो देखूँ!

कुछ तो बात जरूर है…..

बेशुमार ग़ज़लें लिख रहे हो, कुछ तो बात जरूर है,
बड़े बदले-बदले लग रहे हो, कुछ तो बात जरूर है!

यूँ शेर पे शेर अर्ज़ तुम पहले तो नहीं करते थे जी,
अब जो शायराना हो रहे हो, कुछ तो बात जरूर है!

आँखों में आँखें डालकर क्युं गुफ्त़गू नहीं करते तुम,
नजरें जो सबसे चुरा रहे हो, कुछ तो बात जरूर है!

ऐसी भी क्या जल्दी है तुमको जो उठकर चल दिए,
यूँ जो तनहा हुए जा रहे हो, कुछ तो बात जरूर है!

तुम अकेलेपन को सीने से लगाके बैठे हो आजकल,
बे-वजह ही मुस्कुरा रहे हो, कुछ तो बात जरूर है!